जयंती पर विशेष : अटल जी के मन मे नेता कम कवि ज्यादा बसता था...




 महान राष्ट्रवादी, प्रखर वक्त़ा,पूर्व प्रधानमंत्री भारत रतन परम श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती पर विशेष 


"ऐसी सत्ता को चिमटे से भी छुना  पसंद नहीं करूंगा"  अटल बिहारी वाजपेयी राजनीतिक सिद्धांतों का पालन करने वाले नेता रहे। राजनीति में शुचिता के सवाल पर एक बार उन्होंने कहा था। मैं 40 साल से इस सदन का सदस्य हूं , सदस्यों ने मेरा व्यवहार देखा , मेरा आचरण देखा, लेकिन पार्टी तोड़कर सत्ता के लिए नया गठबंधन करके अगर सत्ता हाथ में आती है तो मैं ऐसी सत्ता को चिमटे से भी छुना पसंद नहीं करूंगा।

अटल जी के दिल में एक राजनेता से कहीं ज्यादा एक कवि बसता था। उनकी कविताओं का जादू लोगों के सिर चढ़कर बोलता रहा है। हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूगा , काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूं, गीत नया गाता हूं.... उनकी कविताओं में से एक है।संसद से लेकर जनसभाओं तक में वह अक्सर कविता पाठ के मूड में आ जाते थे।

        अटल बिहारी वाजपेयी ने हिंदी को विश्व स्तर पर मान दिलाने के लिए काफी प्रयास किये। वह 1977 में जनता सरकार में विदेश मंत्री थे। संयुक्त राष्ट्र संघ में उनके द्वारा दिया गया ,हिंदी में भाषण उस समय काफी लोकप्रिय हुआ था। उनके द्वारा हिंदी के चुने हुए शब्दों का ही असर था कि युएन के प्रतिनिधियों ने खड़े होकर वाजपेयी के लिए तालियां बजाई थी। इसके बाद कई बार अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अटल ने हिंदी में दुनिया को संबोधित किया। उन्हें शब्दों का जादूगर माना गया, विरोधी भी उनकी वाकपटुता और तर्कों के कायल रहे। 1994 में केंद्र की कांग्रेस सरकार ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में भारत का पक्ष रखने वाले प्रतिनिधि मंडल की नुमाइंदगी  अटल जी को सौंपी थी। किसी सरकार का विपक्षी नेता पर इस हद तक भरोसे को पूरी दुनिया में आश्चर्य से देखा गया था। अपने- पराए का भेद किए बिना सच कहने का साहस उनमें था। उनका यह संदेश है, जो आज भी मील का पत्थर बना हुआ है--राजा राजधर्म का पालन करें, राजा के लिए, शासक के लिए, प्रजा-प्रजा में भेद नहीं हो सकता। न जन्म के आधार पर, न जाति के आधार पर और ने संप्रदाय के आधार पर। 1998 में पोककरण परमाणु परीक्षण उनकी इस सोच का परिचायक था, भारत दुनिया में किसी भी ताकत के आगे घुटने टेकने को तैयार नहीं है। उन्होंने एक मौके पर कहा था कि भारत मजबूत होगा, तभी आगे जा सकता है। कोई उसे बेवजह तंग करने की जरूरत महसूस ना करें, उसके लिए हमें ऐसा कर दिखाना जरूरी है।

          आज के प्रतिस्पर्धी राजनीति में मानवीय मूल्यों की कमी और विरोधियों के लिए निष्ठुरता, अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में न थी, सार्वजनिक जीवन में एक दूसरे के विरोधी होने के बावजूद नेताओं में बंधुत्व का भाव था। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी एक ऐसी राजनीतिक परंपरा से ताल्लुक रखते थे, जिसमें राजनीतिक विरोधियों के लिए सम्मान और मानवीय मर्यादा का विशेष स्थान रहा करता था, ऐसा ही एक दिल को छू जाने वाला वाकया अटल बिहारी वाजपेयी के जीवन में घटित हुआ,जिसे उन्होंने स्वयं बयां किया। बात साल 1991 की है,जब पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या हो चुकी थी, बीजेपी के सबसे बड़े कद के नेता अटल बिहारी वाजपेयी उस समय संसद में नेता विपक्ष थे। जब एक वरिष्ठ पत्रकार ने वाजपेयी से राजीव गांधी के बारे में उनकी राय जाननी चाही तो वाजपेयी ने बड़े ही भावुक अंदाज में अपने जीवन का एक किस्सा सुनाते हुए कहा कि यदि वो (अटल बिहारी वाजपेयी) आज जिंदा है तो राजीव गांधी की वजह से, दरअसल बात 1984-1989 के दौर की है जब राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री थे और अटल बिहारी वाजपेयी किडनी संबंधी बीमारी से जूझ रहे थे। तब भारत में इस बीमारी के लिए उत्तम चिकित्सा व्यवस्था उपलब्ध न थी। जिसकी वजह से वाजपेयी को इलाज के लिए अमेरिका जाना पड़ता, लेकिन आर्थिक वजह से वाजपेयी अमेरिका जा पाने में समर्थ नहीं थे।



          शिक्षा के द्वारा व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास होता है। व्यक्तित्व के उत्तम विकास के लिए शिक्षा का स्वरूप आदर्शो से युक्त होना चाहिए। हमारी माटी में आदशौ की कमी नहीं है। शिक्षा द्वारा ही हम नवयुवको में राष्ट्र प्रेम की भावना जागृत कर सकते हैं। शिक्षा का माध्यम मातृभाषा होनी चाहिए, ऊंची से ऊंची शिक्षा मातृभाषा के माध्यम से दी जानी चाहिए। साहित्य और राजनीति के कोई अलग-अलग खाने नहीं होते, राष्ट्र कुछ संप्रदायों तथा जन समूहों का समुच्चय मात्र नहीं अपितु, एक जीवनमान  इकाई है। सेवा-कार्यों की उम्मीद सरकार से नहीं की जा सकती उसके लिए समाज-सेवी संस्थाओं को ही आगे आना पड़ेगा, निरक्षरता और निर्धनता का बड़ा गहरा संबंध है। इन्हीं अनमोल विचारों के साथ अटल बिहारी वाजपेयी ने देश की जनता का मार्गदर्शन किया।

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