संविधान दिवस और ज्योतिबा फुले के स्मृति आलोक में नदलेस ने की काव्य पाठ एवं नव सदस्य सम्मेलन गोष्ठी













  नई दिल्ली। संविधान दिवस और ज्योतिबा फुले के स्मृति आलोक में नदलेस द्वारा ऑनलाइन आयोजित काव्य पाठ एवं नव सदस्य सम्मिलन दिवस विशेष मासिक गोष्ठी अपेक्षाकृत सफल रही। गोष्ठी में देश भर से जुड़े साहित्यकारों ने एक से बढ़कर एक रचना प्रस्तुत की। तहत और तरन्नुम से प्रस्तुत की गई रचनाओं ने, न सिर्फ भाव अभिभूत किया बल्कि प्रस्तुति के अंदाज ने भी मंत्रमुग्ध किया। सभी रचनाकारों की रचनाओं में समाज और जीवन की बारीक समझ, अनुभव और संघर्ष के साथ-साथ सामाजिक कुरीतियां और भेदभाव के प्रति आक्रोश और चिंता साफ नजर आई। गोष्ठी की अध्यक्षता डा. कुसुम वियोगी ने की और संचालन डा. अमित धर्मसिंह ने किया। हुमा खातून, हरीश चंद्र पांडल, विनोद सिल्ला, डा. रामबचन यादव, बंशीधर नाहरवाल, डा. मनोरमा गौतम, अनिल बिडलान, देव प्रसाद पातरे, अजय यतीश, ममता अंबेडकर, नीरज कुमार नेचुरल, योगेंद्र प्रसाद अनिल, शकुंतला दीपांजलि, हरितोष मोहन, खन्नाप्रसाद अमीन, कांता बौद्ध, चितरंजन गोप लुकाटी, एस. एन. प्रसाद और डा. कुसुम वियोगी आदि प्रतिष्ठित और नवोदित साहित्यकारों ने सशक्त रचनापाठ किया। गोष्ठी में डा. एल. सी. जैदिया जैदि, डा. एम. एन. गायकवाड, अजीत सिंह, डा. गीता कृष्णांगी, डा. आर. सी. यादव, राजेंद्र कुमार निब्बन, शैल कुमारी शाक्य, ओमप्रकाश सिंह, डा. अमिता मेहरोलिया, बृजपाल सहज, लोकेश कुमार, शिव बच्चन बौद्ध, डा. विक्रम कुमार, रोकसी कुमारी, डा. हरिराम मीणा, धर्मवीर सिंह और इंदु रवि आदि साहित्य अध्येता और रचयिता उपस्थित रहें। 

           एस. एन. प्रसाद, लखनऊ द्वारा पढ़ी गई ग़ज़ल की काव्य पंक्तियां कुछ इस प्रकार रही -"गुरुर का एक यह भी अंदाज देखिये/आदमी पर झपटता है बाज देखिये/कल तक टेकता रहा जो घुटने/हो गया है अब बेअन्दाज  देखिये/नफरतों की आग में रिश्ते हुए फ़ना/कैसे बदल रहा है समाज देखिये।" हरीश चंद्र पांडल ने व्यवस्था कविता कुछ यूं प्रस्तुत की-"हमारे बीच रहकर ही /हमारे खिलाफ/फैसले लेते हैं/हमारे पीढ़ि को गुलाम/बनाकर हमें ही/हुक्म देते हैं!" ममता अंबेडकर ने संविधान दिवस से संबंधित रचना का पाठ किया - "सबसे पहले भारत का संविधान/तभी बनेगा देश महान/ इसकी नीति से चलता भारत का इंसान/संविधान से ही मिलता हैं/सबको हक अधिकार/हमेशा याद रखना देश की जनता/से ही बनाता देश  महान।" चितरंजन गोप लुकाटी की सर्वहारा कविता की काव्य पंक्तियां कुछ इस प्रकार रहीं -"तुम्हारा कुरेदना बार-बार सह लेता हूं मैं/आधार पर आघात बर्दाश्त कर लेता हूं/एक पेट बारूद ठूंसकर भी/जिससे उड़ा सकता हूं/इस छोटी-सी पृथ्वी को/ मगर शांत हूं मैं!" कांता बौद्ध ने अपनी कविता 'ऐसा तो नहीं था मेरा सोना' में कुछ यूं पढ़ा -"मन में ख्याल आया/जैसे कह रहे हैं बाबा साहब/ विचार छूट गया/कर्मकांड रह गया/ ऐसा तो नहीं था मेरा सपना।" विनोद सिल्ला की कविता 'अंतिम पायदान का व्यक्ति' की काव्य पंक्तियां इस प्रकार रही -"वो है अंतिम पायदान पर धकेला गया व्यक्ति/उसके द्वार पर होती है दस्तक धर्माचार्यों की/इस आग्रह के साथ/धर्म है असुरक्षित/करो शामिल अपने नवयुवकों को/धर्म की लड़ाई में।" डा. खन्नाप्रदाद अमीन ने समानता के सूत्रधार शीर्षक से कविता कुछ यूं पढ़ी -"ओह! समानता के सूत्रधार/आपने बहुत किए निर्धार/समानता का हक संविधार में/फिर भी आज अफसोस के साथ कहता हूं/समानता के लिए करने पड़ते हैं संघर्ष।" अध्यक्षता कर रहे डा. कुसुम वियोगी ने कहा कि नदलेस सबको जोड़े सबसे जुड़े के आधार पर काम कर रहा है। इसने दलित साहित्य की दो पीढ़ियों को एक मंच पर लाने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। आज की गोष्ठी में सभी रचनाकारों ने सामाजिक परिवर्तन की एक से बढ़कर एक कविता प्रस्तुत की। इस संदर्भ में कविता प्रस्तुत करने वाले सभी कवि विशेष सराहना के पात्र हैं। साथ ही गोष्ठी में आखिर तक जुड़े रहने वाले प्रबुद्ध श्रोता एवं कविगण भी विशेष प्रसंशा के पात्र हैं। गोष्ठी में शामिल हुए सभी कवियों एवं श्रोताओं का धन्यवाद ज्ञापन डा. अमित धर्मसिंह ने किया।।

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