नदलेस ने मुकेश मानस पर केंद्रित स्मृति सभा 'मानस के मुकेश' का किया आयोजन




दिल्ली। गत 4 अक्टूबर 2021 को सत्यवती कॉलेज में हिंदी के एसोसिएट प्रोफेसर और एक सशक्त रचनाकार मुकेश मानस का आकस्मिक निधन हो गया था। जिसको लेकर नदलेस ने स्मृति सभा 'मानस के मुकेश' का ऑनलाइन आयोजन किया। स्मृति सभा की अध्यक्षता नदलेस के अध्यक्ष डा. अनिल कुमार ने की और संचालन सचिव डा. राम कैन ने किया। मुख्य वक्ताओं में डा. कुसुम वियोगी, रत्न कुमार सांभरिया, ईश कुमार गंगानिया, बजरंग बिहारी तिवारी और पुष्पा विवेक जी रहे।


अतिथियों का स्वागत और मुकेश मानस जी का संक्षिप्त परिचय नदलेस के उपाध्यक्ष डा. अमित धर्मसिंह ने प्रस्तुत किया व धन्यवाद ज्ञापन प्रचार सचिव डा. अमित कुमार ने किया। मुकेश मानस सत्यवती कॉलेज में हिंदी के एसोसिएट प्रोफेसर थे। वे मगहर का संपादन करते थे। उनके तीन कविता संग्रह पतंग और चरखड़ी, कागज एक पेड़ है, धूप है खिली अभी, एक कहानी संग्रह 'उन्नीस सौ चौरासी', दो अनुदित पुस्तक कांचा इलैया की वाई एम नॉट ए हिंदू और एम एन राय की इंडिया इन ट्रांजिशन तथा  'मीडिया लेखन सिद्धांत और प्रयोग' नामक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी थीं। वे सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी निभाते थे तथा संबंधित संस्थाओं से जुड़कर निरंतर सक्रिय और रचनाशील रहते थे। उनकी वैचारिकी मार्क्सवाद और आंबेडकरवाद से प्रेरित थी। अध्यक्ष डा. अनिल कुमार ने कहा कि एक जुझारू साहित्यकार और एक्टिविस्ट का अचानक चले जाना हृदय विदारक तो है ही, साथ ही हिंदी दलित साहित्य की अपूर्णीय क्षति भी है। अभी मुकेश मानस जी का और भी साहित्य सृजन सामने आना था, लेकिन असमय चले जाने से उनके सृजन का काफी हिस्सा अपूर्ण रह गया है। मजबूरन, उनका जो भी साहित्य है, आज हमें उसी में संतोष करना पड़ेगा। उनके उपलब्ध साहित्य का यदि सही मूल्यांकन हो पाया तो यही उनके प्रति सच्ची आदरांजलि होगी।

           स्मृति सभा 'मानस के मुकेश' में दलित साहित्य जगत के महत्त्वपूर्ण दलित साहित्यकार मुकेश मानस से जुड़ी स्मृतियों और उनके रचनात्मक पक्ष पर प्रतिष्ठित दलित साहित्यकारों ने अपने-अपने विचार साझा किए। पुष्पा विवेक जी को कार्यक्रम की पहली वक्ता के रूप में आमंत्रित करते हुए कार्यक्रम का आरंभ किया गया। उन्होंने मुकेश मानस को एक आंदोलनकारी साहित्यकार बताते हुए कहा कि वे अपने परिवार की देखपाल कई वर्षो पहले अपने पिता की मृत्यु के पश्चात से करते आ रहे थे। भाई बहनों को कभी उन्होंने पिता की कमी महसूस नहीं होने दी। लेकिन अपने जीवन के अंतिम दिनों में वे टूट गए थे और ये टूटन उनके काव्य में भी झलकती है। पुष्पा जी के पश्चात बजरंग बिहारी तिवारी जी ने आज के समय में लोगो के बीच समाप्त होती मेलजोल की भावना को अवसाद का कारण बताया जिसके शिकार आज कल के साहित्यकार हो रहे हैं। तिवारी जी ने पुष्पा जी से असहमति जताते हुए कहा कि ऐसा नहीं है कि उनमें जिजीविषा नहीं थी वरन उनमें जिजीविषा का आधिक्य था। उनके अनुसार दिल्ली में सर्वाधिक साहित्यकार हैं परंतु गुजरात और बंगाल की तरह यहां दलित साहित्य अकादमी नही है। उन्होंने दलित साहित्य अकादमी की स्थापना और मुकेश मानस के साहित्य को दलित साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित करने की बात रखी। अगले वक्ता ईश कुमार गंगानिया जी ने बताया कि मुकेश मानस किसी भी चीज से बड़े अपनत्व से जुड़ते थे। उनका यह अपनत्व हर विचारधारा के लोगों के साथ एक जैसा था। उन्होंने बताया कि यह गलत है कि वे जीना नहीं चाहते थे। उनमें जीने की जबरदस्त चाह थी।  'He claimed himself- I am a glamorous person' . हर इंसान की तरह उनमें भी खामियां और खासियतें थीं। उनके सकारात्मक पक्ष को हमें अपनाना चाहिए। गंगानियां जी ने मुकेश मानस की डायरी के बारे में बताते हुए कहा कि उनकी आत्मकथा के कुछ नोट्स बने हुए हैं। उनकी कई रचनाएं हैं जिन्हें प्रकाशित किया जाना चाहिए और दलित साहित्य अकादमी की स्थापना होनी चाहिए। अगले वक्ता के रूप में रत्न कुमार संभरिया जी ने कहा कि मुकेश मानस कविता के एक अच्छे समीक्षक भी थे। उनके अनुसार मुकेश मानस उजास नाटक से अत्यधिक प्रभावित रहे। उनका विचार था कि दलित जब तक अपने व्यवसायों को नहीं बदलेंगे तब तक उनकी स्थिति नही बदलेगी। सांभरिया जी के अनुसार मुकेश मानस दलित साहित्य की दशा और दिशा के लिए चिंतित रहते थे और दलितों को एकजुट होकर लिखने की मांग करते थे। मुकेश मानस की कविता -" कवि के लिए कठिन समय" कविता को उद्धृत करते हुए सांभरिया जी ने बताया कि कवि भी साधारण व्यक्ति ही होता है परंतु बाहर से। भीतर से वह अपनी ही समस्याओं में उलझा होता है। 

            कार्यक्रम से जुड़े टेकचंद जी ने मुकेश मानस की पारिवारिक पृष्ठभूमि और समस्याओं के संदर्भ में समस्याओं को खोला और इस बात पर बड़ा जोर दिया कि हमे सदैव धीर गंभीर कार्यक्रम ही आयोजित नहीं करने चाहिए कुछ ऐसे कार्यक्रम भी आयोजित किए जाने चाहिए जिसमें एक-दूसरे से मन की बातें हों और हंसी मजाक हो। डा.  कुसुम वियोगी जी ने अपने वक्तव्य में कहा की मुकेश मानस जी हमारे बीच अपने विचारों , अपनी कविताओं, अपनी कहानियों में रहेंगे और यह प्रयास किया जायेगा कि उनका अप्रकाशित साहित्य जल्द ही एक या दो जिल्द में प्रकाशित किया जाए। उन्होंने  दलित साहित्य अकादमी की स्थापना करवाए जाने की भी बात रखी। इस प्रकार यह कार्यक्रम मुकेश मानस के व्यक्तिगत और रचनात्मक पहलुओं को नई पीढी के सामने उजागर करने वाला एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम रहा।  सभी वक्ताओं ने माना कि मुकेश मानस का समग्र साहित्य सामने आना चाहिए। उनके समग्र साहित्य को प्रकाशित करना चाहिए साथ ही उसका उचित मूल्यांकन करना चाहिए। कार्यक्रम उमरशाह, डा. गीता कृष्णांगी, आर. एस. आघात, l डा. मुकेश मिरोठा, रिछपाल विद्रोही, अमित कुमारी, राजेंद्र कुमार राज़, रश्मि रल्हन, धीरज वनकर,जलेश्वर गेंडले और राज बंसी आदि करीब पचास से अधिक गणमान्य साहित्यकार ऑनलाइन उपस्थित रहें। 



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