प्राकृति के रौद्र रूप के सामने विज्ञान कितना बेबस

लॉक डाउन मैं सड़कों पर सन्नाटा पसरा हुआ है ,तरह-तरह के पक्षी आसमान में उड़ते दिखाई दे रहे हैं। तरह-तरह की पक्षियों की कोतूहले सुनाई पड़ रही है। शुक्रताल गंगा घाट पर तो मगरमच्छ घूम रहे हैं । नोएडा में मोर नाच रहे हैं नीलगाय सड़कों पर घूम रही है। और तो वैष्णो देवी मार्ग पर शेर भी दिखने लगे हैं। इन सबको देखकर हमें कहीं यह नहीं लगता कि हमने प्राकृतिक का कहीं न कहीं दमन किया है। हमारे बढ़ती जनसंख्या वनों का कटान, और कंक्रीट के जंगलों की हमने आज भरमार लगा दी , वाईफाई ,इंटरनेट के प्रभाव ने छोटी चिड़िया से लेकर बड़े पक्षी बाज और गिद्ध तक की प्रजातियों को संकट में डाल दिया। प्रकृति और वन्य जीव जंतु नष्ट होते  रहे ,और हमने अपना विस्तार पृथ्वी ही नहीं बल्कि अंतरिक्ष तक में करना शुरू कर दिया। परमात्मा की प्रकृति की शक्ति को हमने दर किनारे कर दिया। इस प्रकृति के असंतुलन ने ही मानव जाति को कई बार आगाह किया किंतु हम अपनी वासना और अहंकार प्रवृत्ति के कारण इस को बार-बार दर किनारे करते रहे। हमारे  बड़े बुजुर्गों द्वारा अपने समय के पुराने किस्से और कहानियां हमें मात्र एक पहेली प्रतित होने लगी, और हम सारी बातों को दरकिनार कर विकास की राह में अंधे हो गए, और आज जब प्राकृतिक ने अपना मौत का मुंह खोला तो हमें अपनी औकात पता लगी कि हम चाहे कितने भी प्रगतिवादी हो जाए, कितनी भी ऊंचाइयों को छू ले परंतु प्रकृति के सामने मनुष्य आज भी बोना ही प्रतीत होता है, जब प्राकृति अपने पर आती है तो मानव द्वारा निर्मित सारा विज्ञान सारा प्रगतिवाद धराशाही हो जाता है, और फिर हम चुपचाप प्रार्थना व पूजा करके प्राकृतिक के रोद्र रुप को शांत होने की प्रतीक्षा करते हैं। कहीं दीपक जलाते , तो कहीं ताली और ताली बजाते हैं । आज यह लगता है, की प्राकृतिक की हमें यह अंतिम चेतावनी है ,यदि हम अभी भी ना बदलें तो शायद प्रकृति हमें भविष्य में समझने का मौका ना  देगी।


        ( अवतोष शर्मा स्वतंत्र पत्रकार)