गलत फहमी के चलते नहीं कराते पुरूष नसबंदी- डा. शबीह


नोएडा। नसबंदी को लेकर अब भी पुरूषों को तमाम गलतफहमी हैं, इसी कारण नसबंदी कराने से पुरूष डरते हैं। यह बात पुरूष नसबंदी करने वाली महिला शल्य चिकित्सक डा. शबीह मजहर ने कही।


भंगेल स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र पर तैनात महिला शल्य चिकित्सक डा. शबीह मजहर पिछले छह माह में करीब 50 पुरूषों की नसबंदी कर चुकी हैं। उन्होंने कहा घर संभालने का मामला हो, परिवार संभालने की बात हो अथवा परिवार नियोजन का मुद्दा हो, हर दम समाज का हर तबका महिलाओं को आगे कर देता है। नसबंदी के मामले में तो पुरूषों की भागीदारी बहुत ही कम है। सरकार द्वारा तमाम जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाने के बाद भी इसको लेकर तमाम गलतफहमी और भ्रांतियां बरकरार हैं। उन्होंने बताया जहां पढ़े लिखे वर्ग के पुरूषों को लगता है कि नसबंदी कराने के बाद उन्हें शारीरिक कमजोरी हो जाएगी और संबंध बनाने में दिक्कत आने लगेगी। वहीं मजदूर वर्ग समझता है कि नसबंदी के बाद शारीरिक कमजोरी के चलते वह काम करने लायक नहीं रह जाएंगे और उनके सामने रोजी रोटी का संकट पैदा हो जाएगा। डा. शबीह कहती हैं कि यह दोनों ही बातें गलत हैं। नसबंदी से किसी तरह की कोई कमजोरी नहीं आती है। नसबंदी कराने के तुरंत बाद पुरूष कामकाज कर सकते हैं।


महिला डाक्टर जो करती हैं पुरूषों की नसबंदी-


डा. शबीह जनपद में अकेली ऐसी महिला डाक्टर हैं, जो पुरूषों की नसबंदी करती हैं। डा. शबीह पिछले छह माह में करीब 50 पुरूषों की नसबंदी कर चुकी हैं। जनपद में गत अप्रैल 2019 से लेकर अक्टूबर तक 66 पुरूष नसबंदी हुईं हैं। परिवार नियोजन विशेषज्ञ दीप्ति सिंह का कहना है कि डा. शबीह के व्यक्तिगत प्रयासों से ऐसा संभव हो सका है।


सात मुस्लिम पुरूष भी करा चुके हैं नसबंदी


डा. शबीह ने जिन 50 पुरूषों की नसबंदी की है, उनमें सात पुरूष मुस्लिम भी हैं। इनमें एक उत्तर प्रदेश पुलिस में कार्यरत इंस्पेक्टर भी हैं। इस बारे में डा. शबीह का कहना है कि वह व्यक्तिगत रूप से इस धर्म से जुड़े लोगों को धार्मिक तर्कों के आधार पर प्रोत्साहित करती हैं। उन्होंने कहा कि मुस्लिम भाई यह समझते हैं कि इस्लाम में इसकी मनाही है पर जिस वक्त पाक कुरान शरीफ लिखा गया उस वक्त सर्जरी नहीं होती थी। कुरान शरीफ में बच्चों की तालीम, स्वास्थ्य और बीवी का ख्याल रखने की बात कही गयी है। वर्तमान हालात में यह तभी संभव है जब परिवार छोटा होगा। उन्होंने मुस्लिम भाइयों से परिवार की खुशहाली और तरक्की के लिए परिवार नियोजन अपनाने की अपील की।


बहुत साधारण है शल्य क्रिया-


डा. शबीह ने बताया महिलाओं के मुकाबले पुरूष नसबंदी बहुत ही साधारण प्रक्रिया है। इसमें बिना आपरेशन के एक नर्व को दबाकर बांध दिया जाता है। नस को काटा नहीं जाता है। इससे पति-पत्नी के शारीरिक संबंधों में कोई कमी नहीं आती है। नसबंदी के बाद किसी तरह के आराम, बेड रेस्ट की जरूरत नहीं होती है। इसके तुरंत बाद व्यक्ति अपने काम पर जा सकता है। जिन लोगों की फेमिली पूरी हो गयी हो। यानी दो बच्चे हो, वह नसबंदी करा सकते हैं। जनपद में सरकार की ओर से नसबंदी कराने वालों को दो हजार रूपये प्रोत्साहन राशि के रूप में दिये जाते हैं।  उन्होंने बताया नसबंदी के लिए प्रोत्साहित करने में पीएसआई के विकास और आपरेशन के वक्त सहायक के तौर पर जगत नारायण मौर्य का सहयोग रहता है।


जनपद में एक वर्ष में हुईं 66 पुरूष नसबंदी


परिवार नियोजन विशेषज्ञ दीप्ति सिंह ने बताया  जनपद में एक वर्ष में (अप्रैल से अक्टूबर तक) 66 पुरूषों की नसबंदी हुई। इस दौरान 1385 महिलओं ने नसबंदी करायी। 28 नवम्बर से 4 दिसम्बर तक चले पखवाड़े में तीन पुरूषों और 65 महिलाओं ने नसबंदी करायी।