तेरे सिवा भी हो कोई उसका हयात में......

क़मर अदबी सोसायटी की नशिस्त
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मुज़फ़्फ़रनगर 13 अक्टूबर ( प्रेस विज्ञप्ति)।क़मर अदबी सोसायटी की ओर से काशानाए क़मर केवलपुरी में एक अदबी नशिस्त का आयोजन हुआ।
यह अदबी नशिस्त क़मर अदबी सोसायटी के संरक्षक रहे अब्दुस्सत्तार मरहूम की याद में आयोजित हुई।
अदबी नशिस्त की सदारत बक़ा पुरक़ाज़वी ने फ़रमाई और संचालन अब्दुल हक़ सहर ने किया।


 


 


 


 


शाहिद जिगर ने पढ़ा-
तेरे सिवा भी हो कोई उसका हयात में,
ऐसे मिज़ाज का तेरा शाहिद जिगर कहां।
रौनक़ मुज़फ़्फ़रनगरी का कलाम सराहा गया-
दूर से देखी हर ख़ुशी मैंने,
ज़िन्दगी जी के भी न जी मैंने।
फिर हवादिस ने आ के घेर लिया,
सांस ली थी अभी-अभी मैंने।
कलीम वफ़ा ने हिम्मत से पढ़ा-
हम हैं फ़क़ीर बस हमें दिल में जगह मिले,
क़िस्मत में अपनी घर कहां, दीवारो दर कहां।
मक़सूद हसरत ने पढ़ा-
बन्धे हुए हैं किसी रब्ते गै़ब से दोनों,
बदन बराये कफ़न है,कफ़न बराये फ़रोख़्त।
शाहज़ेब शरफ़ ने पढ़ा-
मुमकिन है लतीफ़ा ही दे जाए नसीहत कुछ,
बेबात के जुमले भी कुछ बात सिखाते हैं।
अल्ताफ़ मशअल ने पढ़ा-
हक़ जताना वो भी जन्नत पर इबादत के बगैर,
क्या कभी उजरत मिला करती है मेहनत के बगैर।
आस मोहम्मद अमीन ने पढ़ा-
कह दिया तुमने सब कहा भी नहीं,
ज़ख्म ऐसा दिया जो भरा ही नहीं।
सुनील 'उत्सव' ने कहा-
तू आज चांदनी में नहाने की ज़िद न कर,
मावस है आसमान में होगा क़मर कहां।
मोहम्मद अहमद ने पढ़ा-
तेरी ख़ता हो और मैं ख़ुद मिन्नतें करूँ,
मेरी तरह से कौन तुझे यूँ मनाएगा।
अब्दुल हक़ सहर कहते हैं-
हो गए गै़र ख़ून के रिश्ते,
घर में रहते हैं अजनबी की तराह।
सदाक़त देवबंदी का कलाम-
यकबयक क्यूं मेरी जानिब से तेरी नज़रें फिरी,
मेरे दुश्मन ने तेरे कान में क्या फूंक दिया।
अन्त में कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे बक़ा पुरक़ाज़वी ने फरमाया-
मन्ज़िल कहां, वो राह कहां, राहबर कहां,
लेकर चला है तू मुझे ज़ोक़े सफ़र कहां।
अन्त में क़मर अदबी सोसायटी के सदस्यों ने सभी आगन्तुकों का आभार प्रकट किया।