अधिक कैलोरीयुक्त भोजन हृष्टपुष्ट नही दुष्ट अधिक बनाता है।


भोजन में कैलोरीज़ की जहाँ बहुत बड़ी आवश्यकता है वहीं बहुत अधिक कैलोरीयुक्त भोजन मनुष्य को हृष्ट पुष्ट की जगह दुष्ट बनाता है। यह बात राष्ट्रीय  पोषण माह के अंतर्गत जैन कन्या इंटर कॉलेज, नई मंडी, मुज़फ़्फ़रनगर में  छात्राओं के समक्ष अपना उद्बोधन देते हुए डॉ पंकज अग्रवाल ने कही।  डॉ अग्रवाल वर्तमान में राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालय, पटेल नगर, मुजफ्फरनगर के प्रभारी चिकित्सा अधिकारी हैं। अपनी बात को उदाहरण से स्पष्ट करने के लिए उन्होंने बताया कि मुंबई में हुए आतंकवादी हमले में आतंकवादियों ने ताज होटल का घेरा डालते हुए कई दिनों तक केवल ड्राई फ्रूट्स व चॉकलेट्स से प्राप्त कैलोरी पर काम चलाया। इस प्रकार यह सिद्ध होता है  कि कभी-कभी कैलोरी युक्त भोजन यदि अधिक मात्रा में लिया जाए तो व्यक्ति के अंदर तामसिक और उग्र भावनाएं भी जन्म ले लेती हैं। इस्क्रा उदाहरण देते हुए डॉ अग्रवाल ने कहा कि चर्बी की अधिकता हो जाने पर शरीर में मेद या वसा बढ़ जाने पर प्राचीनकाल में ऋषि-मुनि और संत लंबे उपवास पर चले जाते थे और उपवासकाल में शरीर में संचित कैलोरी का व्यय करके उर्जा प्राप्त करते थे। इस प्रकार वे कैलोरी के परिग्रह को रोकते थे। कैलोरीयुक्त भोजन का रचनात्मक उदाहरण यह है कि पर्वतारोही दल पर्वतारोहण के क्षण में कैलोरी की आवश्यकता  सूखे मेवों वह चॉकलेट्स से पूरी करते हैं, क्योंकि वह अपने साथ अधिक भारयुक्त भोजन-सामग्री को पीठ पर नहीं ढो सकते।  


इसके स्थान पर डॉ अग्रवाल ने संतुलित और संपूर्ण आहार को ग्रहण करने की आवश्यकता पर बल दिया, जिसमें आवश्यक खनिज पदार्थ और विटामिन शामिल हों। संपूर्ण आहार का उदाहरण देते हुए उन्होंने मारवाड़ी थाली का उदाहरण दिया,  जिसमें कई प्रकार के व्यंजन, दालें और 6  रसों से युक्त भोजन शामिल होता है। इसकी छोटी-छोटी कटोरियों को उन्होंने एक प्रकार से संतुलित आहार का नमूना देते हुए बताया कि जरूरी नहीं है कि प्रतिदिन के आहार में सभी प्रकार के तत्व व भोजन के सभी छहों रस शामिल हों, किंतु वे हमारे भोजन में क्रमागत रूप से अवश्य शामिल होने चाहिएँ। 


एक सर्वे का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों की लड़कियों में रक्ताल्पता का प्रतिशत शहरी क्षेत्र की लड़कियों के मुकाबले कम था। शहरी क्षेत्र की लड़कियों के खान पान के बारे में बताते हुए उन्होंने बताया कि अधिकांश में यह लड़कियां व शहरी क्षेत्र के बच्चे फास्ट फूड पर निर्भर होकर अपनी कैलोरी की बढ़ी हुई आवश्यकता पूरी कर लेते हैं, किंतु इसका नुकसान यह होता है कि उनके भोजन में खनिज तत्वों की मात्रा, अर्थात् मिनरल्स की मात्रा बहुत कम होती है खासतौर से आयरन की और कैल्शियम की, जिसकी लड़कियों और महिलाओं को सर्वाधिक आवश्यकता होती है। इसलिए उन्होंने जोर देकर कहा कि बच्चे हरी सब्जियों को खाने से जी न चुराएँ और हरे साग-सब्जियों को अपने भोजन में प्रचुर मात्रा में शामिल करें, अन्यथा चिकित्सकों  को मजबूर होकर इनके स्थान पर मिनरल्स और कैल्शियम की अतिरिक्त खुराक शरीर में दवा द्वारा पहुंचानी होगी। यह अनिवार्य तो होगा, पर यह सुखद स्थिति नहीं है। अन्य खनिज-तत्त्वों की आवश्यकता को पूरा करने के लिए उन्होंने ताजे फलों और सलाद के सेवन पर भी बहुत जोर दिया। साथ ही बताया कि विटामिंस की शेल्फ लाइफ बहुत कम होती है। इसका अर्थ यह है कि भंडारण करने से विटामिन जो फलों और सब्जियों में मौजूद होते हैं वे धीरे-धीरे नष्ट होते चलते हैं। इसलिए फ्रिज में रखी हुई  साग-सब्जियां और फल देखने में भले ही ताजे महसूस होते हैं, पर सत्य तो यह है कि उनका विटामिन धीरे-धीरे कम या नष्ट हो चुका होता है। अतः फ्रिज में स्टोर किए ताजे फलों के सेवन पर सभी लोग अधिक ध्यान दें, ताकि उनमें मौजूद विटामिन उन्हें समय से पूर्व मिल जाए। डॉ अग्रवाल के लंबे उद्बोधन के बाद विद्यालय की प्रधानाचार्य डॉक्टर कंचनप्रभा ने विचार रखे।